इस मंदिर की स्थापना के बाद से ही शुरू हुआ था नाग पंचमी का त्योहार

इस मंदिर की स्थापना के बाद से ही शुरू हुआ था नाग पंचमी का त्योहार

इस मंदिर की स्थापना के बाद से ही शुरू हुआ था नाग पंचमी का त्योहार : धार्मिक एवं सांस्कृतिक आस्था की नगरी प्रयाग तीर्थों का राजा कहा जाता है। गंगा यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम से लेकर वेणी माधव मंदिर तक इस पावन भूमि पर नाग वासुकी का एक प्राचीनतम मंदिर भी है। जिसकी मान्यता है यदि किसी के घर में सांप निकल रहे हैं या फिर उसके सपने में नाग नागिन दिखाई दे रहे हैं। वह व्यक्ति इस मंदिर का दर्शन करके यहां से पत्थर की 5 गोट्टियां ले जाकर अपने घर में रख ले तो सारे दोष अपने आप खत्म हो जाएगें। प्रधानमंत्री बनने के बाद श्रीमती इंदिरा गांधी ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था।

नाग वासुकी के दर्शन के बिना संगम स्नान का नहीं मिलता फल

– यहां के लोगों का मानना है नाग वासुकी के प्रयाग प्रवास के दौरान देवताओं के विशेष अनुरोध पर ब्रह्मा के मानस पुत्रों द्वारा इस मंदिर की स्थापना की गई थी। जिसमें नाग वासुकी महाराज ने यह शर्त रखी थी कि यदि कोई श्रद्धालु प्रयागराज में संगम स्नान करने आता है तो उनका दर्शन जरूरी होगा।
– यदि प्रयाग में संगम स्नान के बाद नाग वासुकी का दर्शन नहीं करेगा तो उसे संगम स्नान का पूरा फल प्राप्त नहीं होगा।

समुद्र मंथन के दौरान घायल होने के बाद सरस्वती स्नान के लिए आए थे नाग वासुकी

इलाहाबाद शहर में दारागंज मोहल्ले के उत्तर और पूर्व के कोण में गंगा के किनारे स्थित नाग वासुकी मंदिर अस्थापना हजारों वर्ष पूर्व ब्रह्मा के मानस पुत्र द्वारा की गई थी। इस मंदिर की विशेषताओं का वर्णन पुराणों में भी वर्णित है।

बताते हैं कि जब समुद्र मंथन हुआ था मंदराचल पर्वत में नाग वासुकी को रस्सी बनाकर देव और दानवों ने समुद्र में मंदराचल पर्वत की मथनी से मंथन किया था। जिससे नाग वासुकी के शरीर में मंदराचल पर्वत के उबड़ -खाबड़ पत्थरों की वजह से चोट आ गई थी उनका पूरा शरीर लहूलुहान हो गया था।

उनकी हालत देखकर भगवान विष्णु ने उन्हें सलाह दी थी कि वह प्रयाग चले जाएं और वहां पर सरस्वती नदी में स्नान करके वही आराम करें स्वस्थ हो जाएंगे। भगवान विष्णु के कहने पर ही नाग वासुकी प्रयाग आए थे और दारागंज के उत्तरी पूर्वी छोर पर रह कर आराम कर रहे थे।

यहां रहने के दौरान ही वाराणसी के दिवोदास जी महाराज ने नाग वासुकी को प्रसन्न करने के लिए 60 हजार वर्ष तक तपस्या की थी। स्वस्थ होने के बाद जब नाग वासुकी यहां से जाने लगे देवताओं ने उनसे मिन्नत की की वह प्रयाग में ही रुक जाए।

तब नाग वासुकी ने यह शर्त रखी थी कि यदि मैं प्रयाग में रुकूंगा तो संगम स्नान के साथ श्रद्धालु के लिए मेरा दर्शन अनिवार्य होगा और दूसरा सावन की पंचमी के दिन तीनों लोकों में एक साथ मेरी पूजा होगी।

जब देवताओं ने उनकी इन मांगों को स्वीकार किया तब नाग वासुकी जी वहां पर ब्रह्माजी के मानस पुत्र द्वारा वहां पर स्थापित किए गए।

आज भी रात में मंदिर के गर्भगृह में आते हैं नाग वासुकी

मंदिर के पुजारी अंशुमान त्रिपाठी ने बताया, “मंदिर के अंदर स्थित गर्भगृह में प्रतिदिन शाम को भोजन आरती के बाद बिस्तर लगाया जाता है। सुबह जब मंदिर के कपाट खुलते हैं तो बिस्तर का चद्दर अस्त-व्यस्त होता है। जैसे उस पर कोई लेट हो मान्यता है कि नाग वासुकी प्रतिदिन बिस्तर पर आराम करते हैं।”

आसपास के घरों में श्रावण मास में दिखाई देते हैं सांप, पर किसी को नहीं पहुंचाते नुकसान

इस मंदिर के आस-पास बनी सैकड़ों घरों में सावन मास में अक्सर सर्प दिखाई देते हैं।

लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि आज तक इस क्षेत्र के किसी भी व्यक्ति को कभी भी किसी जहरीले जंतु ने नहीं काटा और ना ही किसी को कोई नुकसान पहुंचाया।

इस मंदिर में इच्छाधारी नाग नागिन का जोड़ा भी आता है लेकिन कब आता है कब और कहां चला जाता है किसी को कुछ पता नहीं चलता।

साल भर में सिर्फ एक बार चढ़ता है दूध और धानका लावा

इस मंदिर में साल में सिर्फ एक बार नागपंचमी के दिन ही लोग नाग वासुकी की मूर्ति पर उनका प्रिय प्रसाद दूध और धान का लावा तथा जल अर्पित कर सकते हैं बाकी पूरे साल भर सिर्फ दर्शन करने की अनुमति होती है।

5 महीने तक पंचमी तिथि पर नाग वासुकी का दर्शन करने मात्र से खत्म हो जाते हैं कालसर्प समेत समस्त ग्रहीय दोष

मान्यता है कि जिसकी जन्म कुंडली में कालसर्प दोष होता है वह वैदिक अथवा तांत्रिक विधि से इस मंदिर में पूजा अनुष्ठान कराता है।
लेकिन जो गरीब है जिनकी स्थिति ठीक नहीं है वह अपने कालसर्प की शांति के लिए श्रावण मास की नाग पंचमी से लेकर अगले 5 महीने तक की पंचमी को अगर नाग वासुकी जी का दर्शन और पूजन करता है तो उसका कालसर्प दोष अथवा सर्प से संबंधित किसी भी प्रकार का दोष अपने आप खत्म हो जाता है।
आज यहां पर मेला लगा हुआ है श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगी हुई जो इस मंदिर की प्राचीनता धार्मिकता और आस्था का प्रतीक है।

 

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